# रही सखि!, बात तोर या मोर।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0902-M19-K151
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 151
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 419–420

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>रही सखि!, बात तोर या मोर।  
<a id="line-2"></a>वा दिन कहति रही अति कोमल, प्रियतम नंदकिशोर।  
<a id="line-3"></a>मथुरा जाय लुभाय कूबरिहिं, सुधि बिसरायेउ तोर।  
<a id="line-4"></a>अब कहु प्रियतम अति कोमल या, कर्कश कुलिश करोर।  
<a id="line-5"></a>सखि कह"होत न जो पिय कोमल, नेकहुँ होत कठोर।  
<a id="line-6"></a>तो सोचहु जिय कत कुबरिहुँ तिय, लेति पिया चित चोर।  
<a id="line-7"></a>सखि “कृपालु” कह हारि गई हौं, बात तोर बरजोर॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर के वियोग में एक सखि दूसरी सखि से कहती है- 'अरी सखि! बता तेरी बात रही या मेरी बात रही। उस दिन तू कह रही थी कि श्यामसुन्दर अत्यन्त कोमल हैं। किन्तु देख लिया? मथुरा जाकर कुब्जा में इतने आसक्त हो र हैं कि तुमको बिल्कुल भुला दिया। अत्यन्त कोमल हैं या करोड़ों वज्र के समान कठोर हैं? ने उत्तर दिया-''अरी सखि! होते, किंचित भी कठोर होते, तो तू ही सोच कि भला एक कुबरी स्त्री, अनन्त कोटि कन्दर्प लावण्य को किस प्रकार वश में कर लेती?''"कृपालु' कहते हैं कि सखि ने अपनी हार मान ली और कहा-तेरी बात ही रही अर्थात् श्यामसुन्दर सचमुच अत्यन्त कोमल हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 832-833

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
