# लखी सखि! जब ते सुंदर-श्याम।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0908-M19-K157
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 157
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 422–422

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लखी सखि! जब ते सुंदर-श्याम।  
<a id="line-2"></a>तब ते दृगन सदा सावन जनु, बरसत रह अविराम।  
<a id="line-3"></a>मन हरि लै गयो, दै गयो हरि उर, विरहागिनि वसुयाम।  
<a id="line-4"></a>एक बात समुझाय सखी! मोहिं, मन-बुधि-भइ बेकाम।  
<a id="line-5"></a>उरझाने नैनन पुनि चोरी, मन की कत भइ राम!।  
<a id="line-6"></a>सखि कह"सुन उरझनि सुरझावन, आयो मन तेहि ठाम।  
<a id="line-7"></a>को “कृपालु” सुरझावन की कह, बिको आपु बिनु दाम"॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर के वियोग में एक ब्रजदेबी कहती है-सखि।! जब से श्यामसुन्दर को देखा है, तब से आँखों में सावन की झड़ी के समान निरन्तर आँसू बहते रहते हैं। श्यामसुन्दर मन चुरा ले गये एवं विरह की आग लगा गये। अरी सखि! मेरी बुद्धि तो काम नहीं करती, जरा तू ही बता। एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही है वह यह कि युद्ध तो आँखों आँखों में हुआ था, किन्तु हाय राम! मन की चोरी कैसे हो गई? सखि ने उत्तर दिया-''अरी सखि! सुन, आँखों की उलझन को सुलझाने के लिये मन न्यायाधीश बन कर गया था''। 'कृपालु' के शब्दों में सखि कहती है कि आँखों की उलझन को सुलझाने की कौन कहे, मन ही बरबस उलझ गया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 837

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
