# लगी री मोहिं, श्याम-दृगन की चोट।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0910-M19-K159
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 159
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 423–423

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लगी री मोहिं, श्याम-दृगन की चोट।  
<a id="line-2"></a>पलक न हाय! पलक-दृग लागत, भये पलक ते ओट।  
<a id="line-3"></a>व्याकुल बिनु अपराध प्रान भये, कीन दृगन ने खोट।  
<a id="line-4"></a>मिल्यो जाय अब मनहुँ दृगन सों, तोरि कानि-कुल-कोट।  
<a id="line-5"></a>अब हौं विलपति प्रति कुंजन, उर, धरे विरह की पोट।  
<a id="line-6"></a>तितनोइ खोट “कृपालु” नंद को, ढोटा, जितनोइ छोट॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है कि मुझे श्यामसुन्दर की आँखों की चोट ने घायल कर दिया है। अब उनके पलकों से ओट होते ही एक क्षण को भी चैन नहीं पड़ता एवं आँखों की नींद भी चली गयी। यद्यपि लड़कपन या उद्दण्डता मेरी आँखों ने ही की थी, मेरे प्राणों का कोई भी दोष नहीं था। फिर भी और करे अपराध कोउ और पाव फलभोग'के अनुसार अब प्राण भी अत्यन्त व्याकुल हो रहे हैं। मन ने भी प्राणों से विश्वासघात किया एवं वंश परम्परा के मर्यादा-रूपी किले को तोड़कर आँखों से जा मिला। अब मैं हृदय में विरह का बोझ लिए हुए एवं प्रत्येक कुँज में प्यारे श्यामसुन्दर से मिलन के लिए विलाप करती हुई भटक रही हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि हाय! हाय!! यह नन्द ढोटा जितना ही छोटा है उतना ही खोटा भी है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 839

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
