# लाल को, जाल भली मैं जानी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0912-M19-K161
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 161
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 424–424

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लाल को, जाल भली मैं जानी।  
<a id="line-2"></a>सुनु सखि! तोहिं बताऊँ उनकी, सिगरी कपट कहानी।  
<a id="line-3"></a>तजि पितु मातु बंदिगृह छल बस, बन्यो पूत नँदरानी।  
<a id="line-4"></a>मोर पंख सिर भेद जनावत,"अहि अहार, मधुवानी"।  
<a id="line-5"></a>गुंजमाल, वनमाल रूप-छल, महँगी कौड़ी कानी।  
<a id="line-6"></a>तन घन बिच पट पीत न थिर रह, दामिनि गुन उनमानी।  
<a id="line-7"></a>विपुल छिद्र, छूछो हिय मुरली, जेहि सुनि हम बौरानी।  
<a id="line-8"></a>किमि “कृपालु” इमि प्रकट बखानत, निगम नेति जेहि मानी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी झुंझलाकर विनोदमयी कटूक्ति द्वारा कहती है कि अरी सखी! मैं श्यामसुन्दर के जाल को भली भाँति जानती हूँ। अरी सखि! मैं उनकी सारी ही कपट से भरी हुई बातें बताती हूँ, सुन! अवतार लेते ही माता-पिता से कपट करते हुए जेल छोड़कर यशोदा का पुत्र बन गया। अरी सखि! उसके सिर पर मोर पंख यही तो भेद बताता है कि जैसे मैं (मोर) साँपों को खाता हूँ किन्तु अत्यन्त ही मधुर बोलता हूँ ठीक इसी प्रकार श्यामसुन्दर भी हैं। गुञ्जमाला एवं वनमाला भी देखने मात्र के लिए ही हैं, उसका मूल्य एक कौड़ी भी नहीं। उसके शरीर रूपी बादल पर फहराता हुआ पीताम्बर यही तो सिद्ध करता है कि चपला के समान मेरी प्रीति भी चपल है। इसी तरह उसकी मुरली भी, जिसका हृदय छूछा है एवं जिसमें अनेकानेक छिद्र हैं, जिसे सुनकर हम दीवानी हो जाती हैं, श्यामसुन्दर का पूर्ण परिचय देती है। 'कृपालु' कहते हैं कि जिसे वेदों ने 'नेति नेति'कहा है उसे दोष रूप में क्यों प्रकट वर्णन करती है?

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 840-841

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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