# वियोगिनि, अँसुवन हार पिरोय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0913-M19-K162
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 162
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 424–424

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>वियोगिनि, अँसुवन हार पिरोय।  
<a id="line-2"></a>करि करि सुरति श्यामसुंदर की, विरहिनि छिन-छिन रोय।  
<a id="line-3"></a>गहवर-वन, वृंदावन, निधिवन, निरखि दुसह दुख होय।  
<a id="line-4"></a>सेवा-कुंज सरस रति-रस की, सुरति बिसूरति सोय।  
<a id="line-5"></a>घर-आँगन प्रिय-परिजन भूषन, वसन न भावत कोय।  
<a id="line-6"></a>धनि “कृपालु” तिय तदपि कहति पिय, करिय भाय जो तोय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी दोनों आँखों से लेकर वक्षःस्थल के बीच तक निरन्तर आँसुओं की माला गूँथ रही है। को याद करके क्षण-क्षण में बार-बार रोती है। वृन्दावन एवं निधिवन को देखकर असह्य दुःख होता है। कुंज के रास-रस की बार-बार याद आती है। एवं बाहर तथा प्रिय-परिजन एवं आभूषण सस्त्रादि कुछ भी नहीं अच्छा लगता। 'कृपालु' कहते हैं उस विरहिणी को धन्य है जो इतनी असह्य वेदना के पीने पर भी प्रियतम से रुष्ट नहीं होती वरन् यह कहती है ''प्रियतम जिस प्रकार सुखी रहें वही करें!।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 841-842

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
