# श्याम! हौं योगिनि भेष बनैहौं।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0918-M19-K167
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 167
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 426–426

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>श्याम! हौं योगिनि भेष बनैहौं।  
<a id="line-2"></a>लोक, वेद, कुल-कानि-आनि तजि, त्रिकुटी ध्यान लगैहौं।  
<a id="line-3"></a>जटाजूट निज शीश बँधैहौं, अंग विभूति लगैहौं।  
<a id="line-4"></a>कंथा पहिरि पाणि लै खप्पर, अनशन देह सुखैहौं।  
<a id="line-5"></a>धरि अवधूत स्वाँग जनु शंकर, घर घर अलख जगैहौं।  
<a id="line-6"></a>जो “कृपालु” पिय तबहुँ न पैहौं, विरहागिनि जरि जैहौं॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है कि हे श्यामसुन्दर! अब मैं तुम्हारे मधुर-मिलन के लिए योगिनी का वेश बनाऊँगी। लोक वेद, एवं बंश की समस्त आन-बान को छोड़कर त्रिकुटी के मध्य में ध्यान लगाऊँगी। अपने सिर पर जटा-जूट बँधाऊँगी एवं सारे शरीर में भस्म लगाउँगी। गुदड़ी ओढ्कर एवं हाथ में कमंडल लेकर बिना अन्न-जल के उपवास द्वारा अपने शरीर को सुखा दूँगी। मैं अवधूतों की तरह स्वग बनाकर शंकर जी के समान घर-घर में 'अलख''अलख'का नारा लगाऊँगी। कृपालु' कहते हैं कि इतना करने पर भी यदि प्रियतम को दया न आयेगी एवं वे दर्शन न देंगे, तब मैं विरह को अग्नि में जलकर भस्म हो जाऊँगी।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 845-846

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
