# सखी! कोउ, देउ वैद बुलवाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0928-M19-K177
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 177
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 430–431

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! कोउ, देउ वैद बुलवाय।  
<a id="line-2"></a>हिय बिच शोथ होत जनु हमरे, रहि रहि हाय! पिराय।  
<a id="line-3"></a>हिरदय गति नित बढ़त जात कोउ, हिय जनु सुई चुभाय।  
<a id="line-4"></a>सिगरो तन मम तपत विषम ज्वर, रैन नींद नहिं आय।  
<a id="line-5"></a>छिन-छिन बाढ़त सब रुज लखि सखि!, दृग पावस ऋतु लाय।  
<a id="line-6"></a>एक व्याधि-बस नर मर आली! हमरे अमित बलाय।  
<a id="line-7"></a>कत “कृपालु” अकुलाति अबहिं का, आगे परी लखाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक भोली-भाली विरहिणी श्यामसुन्दर के प्रेम में दीवानी, प्रेम को रोग समझकर अपनी सखी से कहती है।) अरी सखी! मुझे कई शारीरिक कष्ट हैं अतएव कोई जाकर वैद्य को बुला दे। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे हृदय के अन्दर कोई फोड़ा हो रहा है, क्योंकि वह बार-बार पीड़ा करता है, तथा मेरे हृदय को गति भी नित्यप्रति बढ़ती ही जा रही है। हृदय में जैसे कोई सुई-सी चुभो रहा है। मेरा सारा शरीर विषम ज्वर (मलेरिया) से तप रहा है तथा रात में नींद भी नहीं आती, आँखों से पानी निकलता रहता है एवं प्रतिक्षण बढ़ता ही जा रहा है। अरी सखी! एक रोग से ही मनुष्य मर जाता है, मुझे तो अनेक रोग हैं। 'कृपालु'व्यंग्य भरे शब्दों में कहते हैं अरी प्रेम रुग्ण सखी! ये ऐसे रोग हैं अभी क्या हुआ। है। आगे-आगे मालूम पड़ेगा। इसके लिए श्यामसुन्दर ही जब वैद्य बनकर आवें तभी ये रोग जा सकते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 849

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
