# सखी! तोय, योग, वियोग कि दोय?।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0929-M19-K178
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 178
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 431–431

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! तोय, योग, वियोग कि दोय?।  
<a id="line-2"></a>खान-पान कछु नेकु न भावत, सिगरी रैन न सोय।  
<a id="line-3"></a>सजन सनेही सकल जगत के, अरि सम दीखत तोय।  
<a id="line-4"></a>नासा-अग्र-भाग अवलोकत, सुधि बुधि दीनी खोय।  
<a id="line-5"></a>मौन धारि बैठी जनु जग महँ, जड़ चेतन नहिं कोय।  
<a id="line-6"></a>योगिनि और वियोगिनि दोउन, के ये लच्छन होय।  
<a id="line-7"></a>तू “कृपालु” सखि! इनमें को है? साँचु बता दे मोय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखी एक विरहिणी से पूछती है कि तू अष्टांग-योग करने वाली योगिनी है अथवा श्रीकृष्ण प्रेम की वियोगिनी है, या दोनों ही है। क्योंकि वे लक्षण तुझमें दिखाई पड़ रहे हैं जो योगिनी एवं वियोगिनी दोनों में ही होते हैं। तूने खाना-पीना बिल्कुल छोड़ दिया है। सारी रात जागती ही रहती है, संसार के सम्बन्धी एवं कुटुम्बी सब तुझे दुश्मन के समान दिखाई पड़ते हैं। तू नासिका के अग्र-भाग में देखती रहती है एवं अपनी देह की सुधि-बुधि ही खो बैठी है। किसी से भी न बोलती हुई मौन धारण करके पत्थर की मूर्ति की तरह बैठी रहती है, मानो तेरे लिए संसार ही नहीं है। उपर्युक्त बातें योगी लोगों में भी होती हैं एवं श्रीकृष्ण वियोगियों में भी होती हैं। अतएव 'कृपालु' पूछते हैं कि अरी सखी! तू मुझे सच-सच बता दे कि तू योगिनी अथवा वियोगिनी, इन दोनों में से कौन है?

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 850

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
