# सखी! तोय, काउ की दीठि लगी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0930-M19-K179
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 179
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 431–431

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! तोय, काउ की दीठि लगी।  
<a id="line-2"></a>अरुणारे अति नैन तिहारे, जनु कहुँ रैन जगी।  
<a id="line-3"></a>लोक वेद कुल कानि न मानति, नैनन लाज भगी।  
<a id="line-4"></a>कबहुँक रीझति खीझति कबहुँक, जनु कोउ ठगन ठगी।  
<a id="line-5"></a>कबहुँक अट्टहास करि आपुहिं, प्रेमसिंधु उमगी।  
<a id="line-6"></a>हौं “कृपालु” अब जानि गई तू, मोहन-प्रेम पगी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक सखी का प्रियतम से मधुर मिलन एवं दूसरी सखी के द्वारा रहस्योद्घाटन।) अरी सखि! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि तुझे किसी को नज़र लग गयी है। संकेत यह है कि तेरी आँखें किसी को आँखों से मिल गयी हैं। अरी सखी! तेरी आँखें अत्यन्त ही मद से युक्त लाल-लाल दिखाई पड़ रही हैं, जैसे तू कहीं सारी रात जागी हुई हो। तू लोक, वेद और वंश की मर्यादाओं को भी छोड़ बैठी है एवं तेरी आँखों में अब लज्जा का भी निवास नहीं है। अरी सखी! तू कभी अकारण ही प्रसन्न दिखाई देती है एवं कभी अप्रसन्न दिखाई पड़ती है, जैसे कि तुझे किसी छलिया ने अपने प्रेम से छल लिया हो। कभी-कभी तो तू प्रेम-सिन्धु में डूबती-उतराती हुई अत्यन्त ही उन्मत्त की भाँति अपने आप ही खिलखिंलाकर हँसने भी लगती है। 'कृपालु' कहते हैं कि इन सब लक्षणों को देखकर मैं अब भली-भाँति समझ गई कि तू प्यारे श्यामसुन्दर के प्रेम में दीवानी हो गई है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 851

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
