विरह-माधुरी · पद 109
धीर अब, कैसेहुँ नाहिं बँधात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dhīra aba, kaisehuṁ nāhiṁ baṁdhāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1धीर अब, कैसेहुँ नाहिं बँधात।
2कान्हहिं का नहिं कानहिं? कान्हहिं, कानन हौं बिलखात।
3तू निर्मोही! मोही मोही, मो ही सों ही घात।
4प्रान न प्यारे प्राननप्यारे, प्रानन प्यारे भात।
5नैन निहारे नैननि हारे, नैननिहारे गात।
6पलकनि पलक “कृपालु” पलक अब, लगत न नेकहुँ रात॥
हिन्दी भावार्थ
विरहिणी कहती है कि मेरा हृदय प्यारे श्यामसुन्दर के बिना किसी प्रकार भी धैर्य नहीं धारण कर पा रहा है। हाय! हाय!! क्या श्यामसुन्दर बिना कान के हो गये हैं? जो कि मैं उनको वन-वन में बिलखती हुई निरन्तर पुकार करती हूँ और फिर भी वे नहीं सुनते। अरे निष्ठुर! तूने पहले तो मुझको मोहित कर लिया और अब मुझसे ही विश्वासघात कर रहा है। हे प्राणप्यारे! अब मेरे प्राणों में प्राण नहीं रहते वरन् तुम ही रहते हो, अर्थात् मैं वियोग में तन्मय होकर अपने आपको भूल जाती हूँ। इन हठीले नेत्रों ने तुम्हारे नेत्रों की ओर देखा एवं हार गये और फिर हारकर शरीर को भी गँवा बैठे। 'कृपालु' कहते हैं कि अब मेरी पलकों में एक क्षण के लिये भी रात्रि में निद्रा नहीं आती, सारी रात जागती ही रह जाती हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 798