# धीर अब, कैसेहुँ नाहिं बँधात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0860-M19-K109
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 109
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 402–402

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>धीर अब, कैसेहुँ नाहिं बँधात।  
<a id="line-2"></a>कान्हहिं का नहिं कानहिं? कान्हहिं, कानन हौं बिलखात।  
<a id="line-3"></a>तू निर्मोही! मोही मोही, मो ही सों ही घात।  
<a id="line-4"></a>प्रान न प्यारे प्राननप्यारे, प्रानन प्यारे भात।  
<a id="line-5"></a>नैन निहारे नैननि हारे, नैननिहारे गात।  
<a id="line-6"></a>पलकनि पलक “कृपालु” पलक अब, लगत न नेकहुँ रात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

विरहिणी कहती है कि मेरा हृदय प्यारे श्यामसुन्दर के बिना किसी प्रकार भी धैर्य नहीं धारण कर पा रहा है। हाय! हाय!! क्या श्यामसुन्दर बिना कान के हो गये हैं? जो कि मैं उनको वन-वन में बिलखती हुई निरन्तर पुकार करती हूँ और फिर भी वे नहीं सुनते। अरे निष्ठुर! तूने पहले तो मुझको मोहित कर लिया और अब मुझसे ही विश्वासघात कर रहा है। हे प्राणप्यारे! अब मेरे प्राणों में प्राण नहीं रहते वरन् तुम ही रहते हो, अर्थात् मैं वियोग में तन्मय होकर अपने आपको भूल जाती हूँ। इन हठीले नेत्रों ने तुम्हारे नेत्रों की ओर देखा एवं हार गये और फिर हारकर शरीर को भी गँवा बैठे। 'कृपालु' कहते हैं कि अब मेरी पलकों में एक क्षण के लिये भी रात्रि में निद्रा नहीं आती, सारी रात जागती ही रह जाती हूँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 798

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
