विरह-माधुरी · पद 110
न जावो, मथुरा! प्राणाधार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: na jāvo, mathurā! prāṇādhāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1न जावो, मथुरा! प्राणाधार।
2जानि-जानि अनजान बनहु जनि, प्रियतम नंदकुमार।
3गोपिन गोपन गोधन के इक, तुमहिं प्राण साकार।
4तुमहिं बताओ तुम बिनु पुनि कत, रहे प्रान तनुधार।
5उर परतीति न आवति जो कह, अइहौं दिन गये चार।
6कह “कृपालु” पुनि कंस नृशंसहुँ, उर डर बारंबार॥
हिन्दी भावार्थ
(मथुरा प्रयाण के समय श्यामसुन्दर से गोपियों का हे प्राणाधार श्यामसुन्दर! मथुरा मत जाओ! हे प्रियतम! जान-बूझ कर अनजान मत बनो। गोपियों, ग्वालों एवं गायों के एकमात्र तुम्हीं साकार प्राण हो। तुम्हीं बताओ फिर प्राण के बिना शरीर कैसे रह सकता है? यद्यपि तुम कह रहे हो कि हम दो चार दिन में लौट आवेगे किन्तु न जाने क्यों हृदय को विश्वास नहीं हो रहा है। 'कृपालु' कहते हैं कि मुझे उस क्रूर कंस का भी बार-बार डर लग रहा है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 799