विरह-माधुरी · पद 111
न लेजा रे, मम प्रानन-प्रान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: na lejā re, mama prānana-prāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1न लेजा रे, मम प्रानन-प्रान।
2तू न जान अक्रूर क्रूर यह, कान्ह प्रान-बनितान।
3उन बिनु प्रान राख पुनि कैसे, उनके प्रान सखान।
4तजि दैहैं निज प्रान कान्ह बिनु, बछरन अरु गैयान।
5एतिक गोपिन, गोपन, गोधन, दै दे जीवन-दान।
6कह “कृपालु” अक्रूर दोष नहिं, हरि इच्छा बलवान॥
हिन्दी भावार्थ
(श्यामसुन्दर को रथ पर बिठा कर मथुरा ले जाते हुए अक्रूर से गोपियों का करुण-क्रन्दन-) अरे अङ्कूर! मेरे प्राण के प्राण को मत ले जा। ओ क्रूर अक्रूर! तू नहीं जानता कि श्यामसुन्दर ब्रजांगनाओं के मूर्तिमान प्राण हैं। तू यह भी नहीं जानता कि श्यामसुन्दर के प्राण के समान प्यारे सखा लोग उनके बिना प्राण नहीं रख सकते। ब्रज की समस्त गायें और बछड़े आपने प्राण श्यामसुन्दर के बिना जीवित नहीं रह सकते। करोड़ों गोपियों, गोपों एवं गायों के प्राणों की भिक्षा मागँ रही हूँ, प्राणनाथ को न ले जा। इतने में कृपालु' ने कहा अरी सखियों! अक्रूर का कोई दोष नहीं है श्यामसुन्दर की इच्छा ही बलवती है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 799-800