विरह-माधुरी · पद 112
नहिं आये प्रियतम हाय! रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nahiṁ āye priyatama hāya! re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नहिं आये प्रियतम हाय! रे।
2परसों आवन कहि गये पिय दिय, बरसों हाय बिताय रे।
3निशि दिन नैनन नीर बहावत, तबहुँ न हाय! सुखाय रे।
4विरहागिनि हौं जरी जात हौं, कोऊ, हाय! बचाय रे।
5पापि पपिहरा पिवु-पिवु कहि कहि, मो कहँ और जराय रे।
6बिनु “कृपालु” हरि नहिं कोउ अपनो, मो कहँ हाय! लखाय रे॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि जाते समय श्यामसुन्दर ने परसों आने के लिए कहा था किन्तु हाय सखि! बरसों बीत जाने पर भी वे नहीं आये। दिन रात आँसू बहाकर भी आँखें नहीं सूखतीं। मैं विरह की आग में जली जा रही हूँ, हाय सखि! कोई तो बचा लो। पापी पपीहा "पी पी'कहकर मुझको और भी जला रहा है। 'कृपालु' के शब्दों में सखि कहती है कि अब तो श्यामसुन्दर के बिना मुझे कोई भी अपना नहीं दीख रहा है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 800-801