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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 113

निठुर मोहिं, दै गयो विरह अपार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: niṭhura mohiṁ, dai gayo viraha apāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1निठुर मोहिं, दै गयो विरह अपार।

2लै सरवस, बरबस करि बस हरि, बस मधुपुरी मझार।

3वयस-किशोरी रति-रस-बोरी, विकल सकल ब्रजनार।

4धन्य रीत विपरीत प्रीत की, धन्य मीत उपहार।

5कुबरिहिं भोगिनि हमहिं वियोगिनि, योगिनि-योग विचार।

6लखि “कृपालु” व्यवहार प्यार को, बार बार बलिहार॥

हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है कि निष्ठुर श्यामसुन्दर मुझे असह्य विरह-दुःख दे गया है। मेरा सर्वस्व लेकर, हठात् अपने वश में करके स्वयं जाकर मथुरा में बस गया है। यहाँ किशोर अवस्था वाली प्रेम रस में सराबोर समस्त ब्रजगोपियाँ अत्यन्त ही व्याकुल हैं। प्रेम की ऐसी उल्टी रीति एवं प्रियतम की ऐसी ऐंठ को बार-बार धन्यवाद। कुब्जा को तो भोग एवं मुझ विरहिणी के लिए योग, क्या ही सुन्दर विचार किया है! कृपालु' कहते हैं कि प्रेम के ऐसे कपटमय व्यवहार की मैं बार-बार बलैया लेता हूँ।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 801