# न लेजा रे, मम प्रानन-प्रान।

स्थायी पृष्ठ: https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0862-m19-k111/
भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0862-M19-K111
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 111
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 402–403

[English](https://radhey.shreyam1008.com.np/en/prem-ras-madira/pad/prm-0862-m19-k111/) · [पुस्तक की अनुक्रमणिका](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/) · [दोनों भाषाओं में पुस्तक पढ़ें](https://radhey.shreyam1008.com.np/PRM/?pad=862&mode=reader&lang=both) · [दोनों भाषाओं का स्रोत पाठ](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/prm/prm-0862-m19-k111.md)

## मूल पद

<a id="line-1"></a>न लेजा रे, मम प्रानन-प्रान।  
<a id="line-2"></a>तू न जान अक्रूर क्रूर यह, कान्ह प्रान-बनितान।  
<a id="line-3"></a>उन बिनु प्रान राख पुनि कैसे, उनके प्रान सखान।  
<a id="line-4"></a>तजि दैहैं निज प्रान कान्ह बिनु, बछरन अरु गैयान।  
<a id="line-5"></a>एतिक गोपिन, गोपन, गोधन, दै दे जीवन-दान।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” अक्रूर दोष नहिं, हरि इच्छा बलवान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्यामसुन्दर को रथ पर बिठा कर मथुरा ले जाते हुए अक्रूर से गोपियों का करुण-क्रन्दन-) अरे अङ्कूर! मेरे प्राण के प्राण को मत ले जा। ओ क्रूर अक्रूर! तू नहीं जानता कि श्यामसुन्दर ब्रजांगनाओं के मूर्तिमान प्राण हैं। तू यह भी नहीं जानता कि श्यामसुन्दर के प्राण के समान प्यारे सखा लोग उनके बिना प्राण नहीं रख सकते। ब्रज की समस्त गायें और बछड़े आपने प्राण श्यामसुन्दर के बिना जीवित नहीं रह सकते। करोड़ों गोपियों, गोपों एवं गायों के प्राणों की भिक्षा मागँ रही हूँ, प्राणनाथ को न ले जा। इतने में कृपालु' ने कहा अरी सखियों! अक्रूर का कोई दोष नहीं है श्यामसुन्दर की इच्छा ही बलवती है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 799-800

[पिछला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0861-m19-k110/) · [अगला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0863-m19-k112/)

## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

- [आधिकारिक पूर्ण साहित्य संग्रह](https://www.jkpliterature.org.in/)
- [लेखक का आधिकारिक परिचय](https://jagadgurukripalujimaharaj.org.in/)
- [प्रेम रस मदिरा: आधिकारिक पुस्तक विवरण](https://www.jkpliterature.org.in/products/prem-ras-madira-regular-size)
- [संस्करण और स्रोत प्रमाण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/provenance.json)
- [पुस्तकालय के आवरणों का स्रोत विवरण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/books/index.json)
- [स्रोत और पाठ-सुधार](https://radhey.shreyam1008.com.np/collection/)

मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
