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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 108

धन्य चोर सिरमोर, मोर प्रिय,

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dhanya chora siramora, mora priya, paṅkha mora priya shashikula-kāro

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1धन्य चोर सिरमोर, मोर प्रिय,

2पंख मोर प्रिय शशिकुल-कारो।

3कारो तम, कारो पखवारो,

4कारो घन, कारो तन वारो।

5जाही छिन छलिया छिति आयो,

6निज कारी माया विस्तारो।

7ताते तजि बंदीगृह कारी,

8कालिंदिहुँ ते पार सिधारो।

9कर करतूत धूत-मति यशुमति,

10बनि सपूत पुनि लेत सहारो।

11नंद-सदन निधि रतन सुनत पै,

12चोरत निज स्वभाव ते हारो।

13लँगर नवनि, दधि, अंबर हरि अब,

14मोहरि मो हरि मोह रि प्यारो।

15हा! मनमोहन के मन मोह न,

16अब मन मो हन काह विचारो।

17जे बरजोर चोर चूड़ामणि,

18दृश्य पदारथ चोरन हारो।

19पै यह अदृश-अमोघ-ओघ-अघ,

20नामहिं लेत भसम करि डारो।

21चाहत भसम करन मो विरहिनि,

22इहै हेरि विरहानल जारो।

23यह “कृपालु” को अति भय लागत,

24जरि न जाय हिय रूप तिहारो॥

हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी (व्यंग्यपूर्वक) कहती है कि मोर पंख धारण किये हुए चन्द्रवंशीय कलंक स्वरूप एवं चोरों के सरदार मेरे प्रियतम श्यामसुन्दर धन्य हैं। जिस समय उनका अवतार हुआ उस समय अन्धकार भी काला, पक्ष भी काला (कृष्ण पक्ष को जन्माष्टमी थी) बादल भी काले थे तथा शरीर का रंग भी काला हुआ और जैसे ही उस छलिया ने पृथ्वी पर पैर रखे उसने अपनी कपटमयी काली योगमाया का भी अवलम्बन लिया। उसी योगमाया से जेल छोड़कर (जेल के ताले सब खुल गये तथा पहरेदार स्वयं सो गये) काली यमुना को पार किया (जेल का स्वरूप भी काला एवं यमुना का स्वरूप भी काला)। इसके पश्चात् उस छलिया ने योगमाया से यशोदा को मोहित करके, उनका पुत्र न होते हुए भी पुत्र बनकर क लिया। यद्यपि सुना जाता है कि नन्द के भवन में रत्नों का भंडार भरा पड़ा था, किन्तु फिर भी अपने कपट स्वभाव से हारा हुआ वह चोरी करने लगा (चोरी का भी काला स्वरूप) उस छलिया ने पहले तो दही-मक्खन की चोरी की, फिर चीरहरण किया और अब उसने मेरे समस्त सांसारिक स्वजनों की ममता को चुरा लिया। तत्पश्चात् मेरे मन को चुराया। इतने पर भी उस मनमोहन को हृदय में शान्ति नहीं मिली। संसार के बड़े-से बड़े चोरों के सरदार भी जो स्थूल पदार्थ संसार में दिखाई पड़ते हैं उन्हीं को चुराने वाले होते हैं, पर इस छलिया ने तो अनन्त जन्मों के अनंतानंत समस्त अदृश्य पापों को चुरा लिया एवं भस्म कर डाला। यह सब करके भी जब उसे शान्ति न मिली तब मुझ विरहिणी को भी जला डालने की इच्छा से मेरे हृदय में विरह की आग लगा दी। 'कृपालु' कहते हैं कि अपने-आप के जल जाने की तो कोई भी चिन्ता नहीं है पर कहीं इस झगड़ेबाजी में ह हृदय में रहने वाला वह मेरा प्यारा श्यामसुन्दर न जल जाय अर्थात् हृदय में ही विरह की आग जल रही है एवं वहीं प्रियतम भी निवास करते हैं, इसलिए प्रेमिका को उपर्युक्त भय है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 796-798