# धन्य चोर सिरमोर, मोर प्रिय,

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0859-M19-K108
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 108
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 400–401

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>धन्य चोर सिरमोर, मोर प्रिय,  
<a id="line-2"></a>पंख मोर प्रिय शशिकुल-कारो।  
<a id="line-3"></a>कारो तम, कारो पखवारो,  
<a id="line-4"></a>कारो घन, कारो तन वारो।  
<a id="line-5"></a>जाही छिन छलिया छिति आयो,  
<a id="line-6"></a>निज कारी माया विस्तारो।  
<a id="line-7"></a>ताते तजि बंदीगृह कारी,  
<a id="line-8"></a>कालिंदिहुँ ते पार सिधारो।  
<a id="line-9"></a>कर करतूत धूत-मति यशुमति,  
<a id="line-10"></a>बनि सपूत पुनि लेत सहारो।  
<a id="line-11"></a>नंद-सदन निधि रतन सुनत पै,  
<a id="line-12"></a>चोरत निज स्वभाव ते हारो।  
<a id="line-13"></a>लँगर नवनि, दधि, अंबर हरि अब,  
<a id="line-14"></a>मोहरि मो हरि मोह रि प्यारो।  
<a id="line-15"></a>हा! मनमोहन के मन मोह न,  
<a id="line-16"></a>अब मन मो हन काह विचारो।  
<a id="line-17"></a>जे बरजोर चोर चूड़ामणि,  
<a id="line-18"></a>दृश्य पदारथ चोरन हारो।  
<a id="line-19"></a>पै यह अदृश-अमोघ-ओघ-अघ,  
<a id="line-20"></a>नामहिं लेत भसम करि डारो।  
<a id="line-21"></a>चाहत भसम करन मो विरहिनि,  
<a id="line-22"></a>इहै हेरि विरहानल जारो।  
<a id="line-23"></a>यह “कृपालु” को अति भय लागत,  
<a id="line-24"></a>जरि न जाय हिय रूप तिहारो॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी (व्यंग्यपूर्वक) कहती है कि मोर पंख धारण किये हुए चन्द्रवंशीय कलंक स्वरूप एवं चोरों के सरदार मेरे प्रियतम श्यामसुन्दर धन्य हैं। जिस समय उनका अवतार हुआ उस समय अन्धकार भी काला, पक्ष भी काला (कृष्ण पक्ष को जन्माष्टमी थी) बादल भी काले थे तथा शरीर का रंग भी काला हुआ और जैसे ही उस छलिया ने पृथ्वी पर पैर रखे उसने अपनी कपटमयी काली योगमाया का भी अवलम्बन लिया। उसी योगमाया से जेल छोड़कर (जेल के ताले सब खुल गये तथा पहरेदार स्वयं सो गये) काली यमुना को पार किया (जेल का स्वरूप भी काला एवं यमुना का स्वरूप भी काला)। इसके पश्चात् उस छलिया ने योगमाया से यशोदा को मोहित करके, उनका पुत्र न होते हुए भी पुत्र बनकर क लिया। यद्यपि सुना जाता है कि नन्द के भवन में रत्नों का भंडार भरा पड़ा था, किन्तु फिर भी अपने कपट स्वभाव से हारा हुआ वह चोरी करने लगा (चोरी का भी काला स्वरूप) उस छलिया ने पहले तो दही-मक्खन की चोरी की, फिर चीरहरण किया और अब उसने मेरे समस्त सांसारिक स्वजनों की ममता को चुरा लिया। तत्पश्चात् मेरे मन को चुराया। इतने पर भी उस मनमोहन को हृदय में शान्ति नहीं मिली। संसार के बड़े-से बड़े चोरों के सरदार भी जो स्थूल पदार्थ संसार में दिखाई पड़ते हैं उन्हीं को चुराने वाले होते हैं, पर इस छलिया ने तो अनन्त जन्मों के अनंतानंत समस्त अदृश्य पापों को चुरा लिया एवं भस्म कर डाला। यह सब करके भी जब उसे शान्ति न मिली तब मुझ विरहिणी को भी जला डालने की इच्छा से मेरे हृदय में विरह की आग लगा दी। 'कृपालु' कहते हैं कि अपने-आप के जल जाने की तो कोई भी चिन्ता नहीं है पर कहीं इस झगड़ेबाजी में ह हृदय में रहने वाला वह मेरा प्यारा श्यामसुन्दर न जल जाय अर्थात् हृदय में ही विरह की आग जल रही है एवं वहीं प्रियतम भी निवास करते हैं, इसलिए प्रेमिका को उपर्युक्त भय है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 796-798

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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