विरह-माधुरी · पद 107
देखु सखि!, आई ऋतु बरसात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dekhu sakhi!, āī ṛitu barasāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1देखु सखि!, आई ऋतु बरसात।
2याको नित्य मिलन घन श्यामहिं, याही सों इतरात।
3घन गर्जन मिस करति मनहुँ यह, अट्टहास मदमात।
4दामिनि दमकनि मिस जनु छिन-छिन, पुनि-पुनि हिय हुलसात।
5जल बरसन मिस दृग आनँद-जल, बरसावति दिन-रात।
6दादुर धुनि मिस जनु “कृपालु” गुन, गावति श्यामल-गात॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! देख, वर्षा ऋतु भी आ गयी किन्तु प्रियतम नहीं आये। अरी सखि! इस वर्षा रूपी प्रेयसी का घनश्याम-रूपी प्रियतम से नित्य मिलन है, इसी से इतरा रही है। देख सखि! बादलों के गरजने के बहाने पिया मिलन के आनन्द में विभोर होकर मानो अट्टहास कर रही है। बिजली चमकने के बहाने मानो पुनः:-पुनः हृदय में प्रियतम के प्रेम की हिलोरें उठ रही हैं। जलवृष्टि के बहाने मानो पिया-मिलन-जन्य आनन्दाश्रु बरसा रही है। 'कृपालु' कहते हैं-अरी सखि! मेंढकों की रंग-निरंगी ध्वनि के द्वारा मानो आपने प्रियतम काले बादलों का गुणगान भी कर रही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 795