विरह-माधुरी · पद 106
दृग-पट मुकुट लटक पे अटकि गयो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dṛiga-paṭa mukuṭa laṭaka pe aṭaki gayo
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1दृग-पट मुकुट लटक पे अटकि गयो।
2जिन विषयन सों संग सदा सों,
3तिन सों झट मुख मोरि मटकि गयो।
4लोक-लाज बस बरबस हटकत,
5भाजि सलोनी लटनि लटकि गयो।
6पुनि कैसेहुँ हठ करि रोकत, द्रुत,
7भृकुटि-बंक बिनु शंक सटकि गयो।
8पुनि ज्यों बरज्यों दृग दृग मिलि यों,
9लगि टकटकि इकटक जनु टकि गयो।
10लखि “कृपालु” दृग चारि हारि अब,
11निज मन-बुधि पिय पगनि पटकि गयो॥
हिन्दी भावार्थ
(एक सखी का प्यारे श्यामसुन्दर से मधुर-मिलन। मेरी आँखें श्यामसुन्दर के मोर मुकुट की लटक पर अटक गई। जिन आँखों का अनादिकाल से जिन मायिक विषयों का संग चला आ रहा था, उन आँखों ने अब उन समस्त विषयों से सदा के लिए मुख मोड़ लिया है। के कारण हठात् आँखों को मुकुट से हटाया, फिर भी वे आखें वहाँ से हटकर मनोहर घुँघराली लटों में जाकर अटक गयीं। फिर भी किसी प्रकार हठपूर्वक वहाँ से हटाया किन्तु तत्क्षण ही वह भागकर निःशंक टेढ़ी भौहों में आसक्त हो गई। पश्चात् फिर मैंने एक बार हटाने का प्रयत्न किया एवं जैसे ही से हटाया वैसे ही हमारी आँखें प्रियतम की आँखों इस प्रकार मिल गईं तथा टकटको लगाकर इस प्रकार एकटक देखने लगीं जैसे कि मानो चारों आँखों को किसी ने सी दिया हो। 'कृपालु' कहते हैं कि जब प्रेमिका ने देखा कि अब किसी भी प्रकार आँखों-से-आँखें नहीं निकल सकतीं तब हारकर एवं खीझकर अपने मन एवं बुद्धि को भी प्रियतम के चरणों पर पटक दिया, अर्थात् अपना सर्वस्व देकर श्यामसुन्दर की सनातन प्रेयसी बन गई।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 794-795