लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 105

दई! मोहिं, दई पीर बेपीर।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: daī! mohiṁ, daī pīra bepīra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1दई! मोहिं, दई पीर बेपीर।

2नागरि भरन गई रहि गागरि, तहँ नागर रह वीर!।

3वाने ना जाने का कीनो, मारि नैन उर तीर।

4हौं ज्यों-त्यों आई घर लै सँग, मधुर वेदना पीर।

5अब सो पीर दुरावति पै उर, धरत न कैसेहुँ धीर।

6दे “कृपालु” बेपीर पीर यह, अचरज देखु अहीर॥

हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है-'हाय दैया! श्यामसुन्दर ने मेरे हृदय में वेदना पैदा कर दी। अरी सखि! मैं पानी भरने गयी थी, वहीं पर नन्दकुमार था, उसने अपने कटाक्षपात से न जाने वया जादू कर दिया कि मेरे हृदय में मधुर वेदना भर गयी। पहुँची, लोक लज्जा के भय से मैं उस मधुर वेदना को छिपाने का अनेक प्रकार से प्रयत्न करती हूँ किन्तु फिर भी अपने को असफल पाती हूँ। निर्धन किसी को धन नहीं दे सकता किन्तु इस बेपीर अहीर का आश्चर्यजनक चमत्कार देखो कि वे बेपीर होकर भी सबको पीर दिया करते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 793-794