विरह-माधुरी · पद 104
तजी क्यों, प्रियतम ब्रज बनितान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: tajī kyoṁ, priyatama braja banitāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1तजी क्यों, प्रियतम ब्रज बनितान।
2एक सखी अस कह दूजी कह,"यह सखि! हौं नहिं मान"।
3पुनि सो कह"सो आये क्यों नहिं, दूजी कह"हम जान।
4दै हरि विरह चहत हम विरहिनि, परखन श्याम सुजान"।
5पुनि सो कह, सखि! येहि परखन महँ, रह कहु कैसे प्रान।
6कह “कृपालु” अमरत्व दान कर, सोई प्रेम बखान॥
हिन्दी भावार्थ
(श्यामसुन्दर के वियोग में गोपियों का परस्पर वाद-विवाद-) एक सखि कहती है—''आखिर श्यामसुन्दर ने हम सब ब्रजांगनाओं को क्यों छोड़ दिया?'' दूसरी सखि ने कहा—''मैं यह मानने को तैयार नहीं हूँ।'' पहली सखि ने कहा—''तो बता प्रियतम आये क्यों नहीं?'' दूसरी सखि ने कहा—''इसका रहस्य हम जानती हैं। वह रहस्य यह है कि श्यामसुन्दर हम लोगों को वियोग देकर हमारे प्रेम की परीक्षा ले रहे हैं।'' पहली सखि ने कहा—''अच्छा सखि यह बता कि इस परीक्षा में प्राण कैसे रह सकेंगे?'' इतने में 'कृपालु' ने कहा—''अरी सखि! तू तो श्यामसुन्दर से प्रेम करती है और प्रेम अमरत्व प्रदान करता है। अतएव प्राण निकलने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता।''
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 792-793