विरह-माधुरी · पद 103
तजन को, जाय न सहज सुभाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: tajana ko, jāya na sahaja subhāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1तजन को, जाय न सहज सुभाय।
2जासों जाय माय देवकि तजि, यशुमति माय बनाय।
3बंदीगृह तजि पितु वसुदेवहिं, पितु नँदराय बताय।
4मथुरा तजि आयो गोकुल पुनि, नंदगाँव मन-भाय।
5पुनि तजि नंदगाम गये मथुरा, अब द्वारिका सुहाय।
6कह “कृपालु” तबहूँ सखि! तू कत, अस प्रियतम पतियाय॥
हिन्दी भावार्थ
(श्यामसुन्दर के वियोग में ब्रज-देवियों का अरी सखि! जिसका स्वभाव ही परित्याग करने का है, वह किसी प्रकार कैसे मिट सकता है? श्यामसुन्दर जिस देवकी माँ के पेट से पैदा हुए उसको पैदा होते ही छोड़ दिया एवं यशोदा के पुत्र बन गये। इसी प्रकार अपने पिता वसुदेव को जेल में छोड़कर नन्दजी को पिता बना लिया। मथुरा छोड़कर गोकुल आये व गोकुल छोड़कर नन्द गाँव आये। फिर नन्द गाँव छोड़ कर मथुरा गये। अब मथुरा को छोड़कर द्वारिका में सुशोभित हो रहे हैं। 'कृपालु' कहते हैं अरी सखि! यह सब तो ठीक है किन्तु मुझे आश्चर्य यह है कि इतना होने पर भी तू उन्हीं को प्रियतम मानती है एवं उन्हीं पर विशवास भी करती है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 791-792