विरह-माधुरी · पद 102
जियत न मरत न जिय तन भात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: jiyata na marata na jiya tana bhāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1जियत न मरत न जिय तन भात।
2लखि चित घन घन-श्यामहिं चितघन,
3घनश्यामहिं अकुलात।
4उनहिं लखात कलप, पल कल मोहिं,
5कल पल कलप लखात।
6उनहिं भात मुख-नलिन अलिन, मोहिं,
7अलिन नलिन-मुख खात।
8लखत पंख केकिन के, किनके,
9किन के नहिं बिलखात।
10चितवत उत इतरात"कृपालुहिं",
11चितवत उत इत रात॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि मेरा प्राण शरीर में इस प्रकार रहता है कि न तो मैं उसे जीता हुआ ही कह सकती हूँ और न मरा हुआ ही। घने, काले बादलों को देखकर दिव्य चिद्घन-स्वरूप श्यामसुन्दर के लिए मेरा चित्त और भी अधिक व्याकुल हो उठता है। प्रियतम को एक कल्प भी पल के समान मालूम पड़ता है, इसीलिये तो वे मथुरा में चैन की वंशी बजा रहे हैं। किन्तु मैं उनके कथनानुसार (मैं कल आऊँगा) उस कल के एक-एक पल को कल्प के समान बिता रही हूँ। उन्हें तो मथुरा की चन्द्रमुखी सखी अत्यन्त ही मन भा रही है पर मुझे कमल के ऊपर बैठे हुए भौरे उनका स्मरण कराकर अत्यन्त ही दुःखी कर रहे हैं। मैं जहाँ भी कहीं मोर पंख के पड़े हुए टुकड़ों को देखती हूँ तो प्रत्येक को देखते ही मोर पंख वाले श्यामसुन्दर के मधुर-मिलन के लिए अत्यन्त ही अधीर होकर तड़पने लगती हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि श्यामसुन्दर तो मेरी ओर देखने में भी इतराते हैं किन्तु मैं तो यहाँ रात भर उन्हीं की बाट देखती हुई इधर-उधर पागलों-सी घूमा करती हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 790-791