विरह-माधुरी · पद 101
छोरि सखि! लै गयो मम सिंदूर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chhori sakhi!, lai gayo mama sindūra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1छोरि सखि! लै गयो मम सिंदूर।
2रथ बैठारि चल्यो मम देखत, हाय! क्रूर अक्रूर।
3नाम धर्यो अक्रूर कौन येहि, काम इतै जेहि क्रूर।
4सो नहिं जान कान्ह ब्रजवासिन, प्रान-सजीवनि-मूर।
5कलप समान लगत रह पिय भये, पलक ओटहूँ दूर।
6अब “कृपालु” गये दूर बूड़िहैं, उर ब्रज नैनन पूर॥
हिन्दी भावार्थ
र (श्यामसुन्दर के मथुरा गमन के पश्चात् ब्रजगोपियों अरी सखि! हमारे सुहाग-सिन्दूर को अक्रूर छीन ले गया। हाय! हाय! वह अक्रूर कितना क्रूर है जो हम लोगों की आँखों के सामने हमारे प्राणवल्लभ को रथ पर बैठाकर ले गया। किस मूर्ख ने इसका नाम अक्रूर रखा है, जिसका काम नितान्त क्रूर है। अरी सखि! वह नहीं जानता कि ब्रजवासियों के प्राणवल्लभ श्यामसुन्दर ही हैं। जिन श्यामसुन्दर के पलक ओट होने पर ही ब्रजवासियों को कल्प के समान प्रतीत होता था, 'कृपालु' के शब्दों में अब इन श्यामसुन्दर के चले जाने पर हृदय रूपी ब्रज आँखों के आँसुओं की बाढ़ में अवश्यमेव डूब जायेगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 789-790