# छोरि सखि! लै गयो मम सिंदूर।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0852-M19-K101
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 101
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 397–397

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>छोरि सखि! लै गयो मम सिंदूर।  
<a id="line-2"></a>रथ बैठारि चल्यो मम देखत, हाय! क्रूर अक्रूर।  
<a id="line-3"></a>नाम धर्यो अक्रूर कौन येहि, काम इतै जेहि क्रूर।  
<a id="line-4"></a>सो नहिं जान कान्ह ब्रजवासिन, प्रान-सजीवनि-मूर।  
<a id="line-5"></a>कलप समान लगत रह पिय भये, पलक ओटहूँ दूर।  
<a id="line-6"></a>अब “कृपालु” गये दूर बूड़िहैं, उर ब्रज नैनन पूर॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

र (श्यामसुन्दर के मथुरा गमन के पश्चात् ब्रजगोपियों अरी सखि! हमारे सुहाग-सिन्दूर को अक्रूर छीन ले गया। हाय! हाय! वह अक्रूर कितना क्रूर है जो हम लोगों की आँखों के सामने हमारे प्राणवल्लभ को रथ पर बैठाकर ले गया। किस मूर्ख ने इसका नाम अक्रूर रखा है, जिसका काम नितान्त क्रूर है। अरी सखि! वह नहीं जानता कि ब्रजवासियों के प्राणवल्लभ श्यामसुन्दर ही हैं। जिन श्यामसुन्दर के पलक ओट होने पर ही ब्रजवासियों को कल्प के समान प्रतीत होता था, 'कृपालु' के शब्दों में अब इन श्यामसुन्दर के चले जाने पर हृदय रूपी ब्रज आँखों के आँसुओं की बाढ़ में अवश्यमेव डूब जायेगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 789-790

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
