विरह-माधुरी · पद 100
छीनि लइ, इन नैनन मन चैन।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chhīni lai, ina nainana mana chaina
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1छीनि लइ, इन नैनन मन चैन।
2जब ते लखी श्याम सुंदर छवि, पुनि तिन नैनन-सैन।
3तब ते तन-मन-धन-जन भूले, अस जानति रहि मैं न।
4छिन बैठति छिन उठति भजति छिन, नैनन नींद न रैन।
5पल-पल चहति सुरति बिसरावन, पै पलहूँ बिसरै न।
6अब “कृपालु” पिय सखि! कब मिलिहैं, दुख मेटन सुख दैन॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! इन आँखों ने मेरे मन का चैन छीन लिया! जब से श्यामसुन्दर एवं उनकी प्रेमरसभरी चितवन को देखा है, तब से तन, मन, धन एवं प्रियजन सब की सुधि खो चुकी हूँ। अरी सखि! मैं पहले ऐसा नहीं जानती थी। कभी बैठती हूँ, कभी उठती हूँ, कभी भागती हूँ, किसी प्रकार नहीं रहा जाता। निगोड़ी नींद ने भी साथ छोड़ दिया है। प्रतिक्षण श्यामसुन्दर की मोहिनी मूरति को भुलाना चाहती हूँ फिर भी एक क्षण को भी नहीं भुला पाती। 'कृपालु के शब्दों में सखी कहती है-अरी सखि! आनन्द-सिन्धु श्यामसुन्दर अब कब मिलेंगे?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 789