विरह-माधुरी · पद 99
छिनहिं छिन नैनन नीर भरे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chhinahiṁ chhina nainana nīra bhare
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1छिनहिं छिन नैनन नीर भरे।
2मनमाने इन नैनन, उनके, नैनन जाय लरे।
3इन नैनन बानन उन नैनन, बानन प्रान हरे।
4इन नैनन रोवत उन नैनन, मृदु मुसकात खरे।
5इन नैनन उन नैनन झगरत, हम बिनु बात मरे।
6सुनी “कृपालु” न पाप और कर, भोगन और परे॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि अरी सखि! मेरी आँखें प्रतिक्षण आँसुओं के जल से भर आया करती हैं। मेरे ये मनमाने नेत्र श्यामसुन्दर के नेत्रों से जाकर लड़ गये। उनके नैनों ने मेरे नैनों के प्राण हर लिये अर्थात् उनके कटाक्ष से ये घायल हो गये। जिसके परिणाम स्वरूप अब मेरे नेत्र निरन्तर आँसू बहा रहे हैं एवं श्यामसुन्दर के नेत्र जीत जाने के कारण मन्द-मन्द मुस्करा रहे हैं। मेरे और श्यामसुन्दर के नेत्रों के झगड़े में अकारण ही बीच में मैं मारी जा रही हूँ। "कृपालु कहते हैं कि अरी सखी! तूने यह नहीं सुना क्या कि 'और करै अपराध'कोउ और पाव फल भोग", अर्थात् अपराध दूसरा करे एवं फल दूसरा भोगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 788-789