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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 98

चल्यो कित, लै प्रानन अक्रूर।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chalyo kita, lai prānana akrūra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1चल्यो कित, लै प्रानन अक्रूर।

2तू नहिं जानत ब्रज बनितनि को, सोइ सुहाग-सिंदूर।

3अगनित ब्रज-बनितनि तनु हत्या, करन चहत कत क्रूर।

4तनु बिनु प्रान रहैं कहु कैसे, सो मम जीवन-मूर।

5जासु संग नित-प्रति नव-नव रस, बरसत रह भरपूर।

6ब्रजगोपिन “कृपालु” किमि जीवहिं, भये प्राण-धन दूर॥

हिन्दी भावार्थ

(श्यामसुन्दर के मथुरा गमन के अवसर पर अक्रूर से गोपियों की कटूक्ति) अरे अक्रूर! मेरे प्राण श्यामसुन्दर को कहाँ ले चला? तू नहीं जानता करोड़ों ब्रजांगनाओं के सुहाग का सिन्दूर वही है। अरे क्रूर! अनन्त ब्रजांगनाओं की क्यों हत्या करना चाहता है? वे ग के प्राण हैं। तू ही बता, प्राण के बिना शरीर कैसे रह सकता है? जिन प्रियतम के साथ नित्य-प्रति नवीन-नवीन प्रेमरस कौ वर्षा हुआ करती थी, 'कृपालु' के शब्दों में उन प्राणवल्लभ श्यामसुन्दर के चले जाने पर ब्रजदेवियाँ किस प्रकार जीवित रह सकेंगी।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 787-788