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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 97

चलन चह, तनु तजि मथुरा प्रान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chalana chaha, tanu taji mathurā prāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1चलन चह, तनु तजि मथुरा प्रान।

2कछु सखि रहीं ठगी सी ठाढ़ी, देखन निज अँखियान।

3कछु सखि रहीं लिपटि रथ, कछु सखि, अश्वन-पग लिपटान।

4कछु सखि रहीं सोय रथ पथ महँ, कहि"हा श्याम-सुजान"।

5कछु सखि"रे अक्रूर क्रूर!"कहि, गिरीं धरणि नहिं भान।

6कह “कृपालु” जो लखि सक सो दुख, सो जड़ मोहिं समान॥

हिन्दी भावार्थ

हुए श्यामसुन्दर के हेतु ब्रजांगनाओं को उक्ति) अरी सखि! एक आश्चर्य सुन! प्राण शरीर को छोड़ कर मथुरा जा रहा है-जीवात्मा शरीर है परमात्मा उसका प्राण है। जिस प्रकार पाञ्चभौतिक शरीर प्राण के बिना नहीं रह सकता उसी प्रकार प्राण के प्राण श्यामसुन्दर के बिना उनका प्राण भी नहीं रह सकता। यह समाचार सुनकर कुछ सखियाँ ठगी सी खड़ी रह गयीं, कुछ सखियाँ रथ से लिपट गयीं, कुछ सखियाँ घोड़ों के पैरों से लिपट गयीं, कुछ सखियाँ रथ के मार्ग में लेट गयीं। कुछ सखियाँ 'अरे क्रूर अक्रूर'ऐसा कह कर पृथ्वी पर गिर कर मूर्च्छित हो गयीं। 'कृपालु' कहते हैं उस दयनीय दशा को मेरे अतिरिक्त और कौन जड़ है जो सह सके?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 786-787