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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 96

गयो सखि!, चतुरानन सठियाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gayo sakhi! chaturānana saṭhiyāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1गयो सखि!, चतुरानन सठियाय।

2चतुरानन के आठ नयन पै, परत न नेकु लखाय।

3जग देखन कहँ नैन एक ही, मोहिं पर्याप्त जनाय।

4पै चाहत रह हरि देखन कहँ, अगनित नैन बनाय।

5पुनि नैनन महँ पलक बनायो, गइ विधि बुधि बौराय।

6धनि “कृपालु” त्रिभुवन सो सुरपति, जो सहस्त्र दृग पाय॥

हिन्दी भावार्थ

एक झुँझलायी हुई विरहिणी ब्रह्मा को कोसती हुई कहती है कि अरी सखि! ब्रह्मा तो सठिया गया है। यद्यपि ब्रह्मा के आठ नेत्र हैं फिर भी उसे कुछ नहीं दिखाई पड़ता। अरी सखि! संसार के देखने के लिए तो एक ही आँख पर्याप्त थी किन्तु श्यामसुन्दर को देखने के लिए तो उसे असंख्य नेत्र बजाने चाहियें थे। सखि! और तो देख, ब्रह्मा बिल्कुल पागल हो गया जो इन दो आँखों में भी पलक बना दिये। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है कि त्रैलोक्य में एकमात्र भाग्यवान इन्द्र ही है जिसके हजारों नेत्र हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 786