विरह-माधुरी · पद 95
गयो लै, प्रान प्रान को प्रान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gayo lai, prāna prāna ko prāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1गयो लै, प्रान प्रान को प्रान।
2अब बिनु प्रान राख तनु कैसे, सिगरी ब्रज बनितान।
3को काको समुझाय कहा जब, काउ न काउहिं भान।
4कोउ ठाढ़ी जनु चित्रलिखी सी, नहिं पिय-ध्यानहुँ ध्यान।
5कोउ बैठी धरि चिबुक पाणि बस, पोय माल अँसुवान।
6कोउ बावरि ह्वै इत-उत भाजति, कहि हा! श्याम-सुजान।
7कोउ उर धरि कर हाय! हाय! कर, कोउ लपटाति लतान।
8कोउ “कृपालु” मुर्छित छिति पर गिरि, को कह दुख सखियान॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर के मथुरा गमन के पश्चात् विरह विह्वला ब्रजांगनाएँ कहती हैं अरी सखि! मेरे प्राण श्यामसुन्दर को मेरे प्राण का प्राण अर्थात् अक्रूर मथुरा ले गया। अब प्राण के बिना ब्रजांगनाओं का शरीर कैसे रहेगा? कौन किसको क्या समझाये, जब किसी को किसी का भान ही नहीं है। कोई सखी पत्थर की मूर्ति की भाँति खड़ी रह गई उसे प्रियतम के ध्यान का भी ध्यान न रहा। कोई सखी ठोढ़ी पर हाथ रखकर आँसू नहाती हुई बैठी ही रह गई। कोई पागल सी "'हा श्यामसुन्दर!''कह इधर-उधर भागने लगी। कोई सखी हृदय पर हाथ रख कर हाय! हाय! करने लगी। कोई लताओं से लिपटने लगी। 'कृपालु' कहते हैं कि कोई मूर्च्छित होकर पृथ्बी पर गिर पड़ी। इन ब्रजांगनाओं के दुःख को कौन कह सकता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 785-786