# गयो सखि!, चतुरानन सठियाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0847-M19-K096
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 96
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 395–395

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>गयो सखि!, चतुरानन सठियाय।  
<a id="line-2"></a>चतुरानन के आठ नयन पै, परत न नेकु लखाय।  
<a id="line-3"></a>जग देखन कहँ नैन एक ही, मोहिं पर्याप्त जनाय।  
<a id="line-4"></a>पै चाहत रह हरि देखन कहँ, अगनित नैन बनाय।  
<a id="line-5"></a>पुनि नैनन महँ पलक बनायो, गइ विधि बुधि बौराय।  
<a id="line-6"></a>धनि “कृपालु” त्रिभुवन सो सुरपति, जो सहस्त्र दृग पाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक झुँझलायी हुई विरहिणी ब्रह्मा को कोसती हुई कहती है कि अरी सखि! ब्रह्मा तो सठिया गया है। यद्यपि ब्रह्मा के आठ नेत्र हैं फिर भी उसे कुछ नहीं दिखाई पड़ता। अरी सखि! संसार के देखने के लिए तो एक ही आँख पर्याप्त थी किन्तु श्यामसुन्दर को देखने के लिए तो उसे असंख्य नेत्र बजाने चाहियें थे। सखि! और तो देख, ब्रह्मा बिल्कुल पागल हो गया जो इन दो आँखों में भी पलक बना दिये। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है कि त्रैलोक्य में एकमात्र भाग्यवान इन्द्र ही है जिसके हजारों नेत्र हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 786

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
