# तजी क्यों, प्रियतम ब्रज बनितान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0855-M19-K104
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 104
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 398–398

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>तजी क्यों, प्रियतम ब्रज बनितान।  
<a id="line-2"></a>एक सखी अस कह दूजी कह,"यह सखि! हौं नहिं मान"।  
<a id="line-3"></a>पुनि सो कह"सो आये क्यों नहिं, दूजी कह"हम जान।  
<a id="line-4"></a>दै हरि विरह चहत हम विरहिनि, परखन श्याम सुजान"।  
<a id="line-5"></a>पुनि सो कह, सखि! येहि परखन महँ, रह कहु कैसे प्रान।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” अमरत्व दान कर, सोई प्रेम बखान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्यामसुन्दर के वियोग में गोपियों का परस्पर वाद-विवाद-) एक सखि कहती है—''आखिर श्यामसुन्दर ने हम सब ब्रजांगनाओं को क्यों छोड़ दिया?'' दूसरी सखि ने कहा—''मैं यह मानने को तैयार नहीं हूँ।'' पहली सखि ने कहा—''तो बता प्रियतम आये क्यों नहीं?'' दूसरी सखि ने कहा—''इसका रहस्य हम जानती हैं। वह रहस्य यह है कि श्यामसुन्दर हम लोगों को वियोग देकर हमारे प्रेम की परीक्षा ले रहे हैं।'' पहली सखि ने कहा—''अच्छा सखि यह बता कि इस परीक्षा में प्राण कैसे रह सकेंगे?'' इतने में 'कृपालु' ने कहा—''अरी सखि! तू तो श्यामसुन्दर से प्रेम करती है और प्रेम अमरत्व प्रदान करता है। अतएव प्राण निकलने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता।''

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 792-793

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
