# देखु सखि!, आई ऋतु बरसात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0858-M19-K107
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 107
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 400–400

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>देखु सखि!, आई ऋतु बरसात।  
<a id="line-2"></a>याको नित्य मिलन घन श्यामहिं, याही सों इतरात।  
<a id="line-3"></a>घन गर्जन मिस करति मनहुँ यह, अट्टहास मदमात।  
<a id="line-4"></a>दामिनि दमकनि मिस जनु छिन-छिन, पुनि-पुनि हिय हुलसात।  
<a id="line-5"></a>जल बरसन मिस दृग आनँद-जल, बरसावति दिन-रात।  
<a id="line-6"></a>दादुर धुनि मिस जनु “कृपालु” गुन, गावति श्यामल-गात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! देख, वर्षा ऋतु भी आ गयी किन्तु प्रियतम नहीं आये। अरी सखि! इस वर्षा रूपी प्रेयसी का घनश्याम-रूपी प्रियतम से नित्य मिलन है, इसी से इतरा रही है। देख सखि! बादलों के गरजने के बहाने पिया मिलन के आनन्द में विभोर होकर मानो अट्टहास कर रही है। बिजली चमकने के बहाने मानो पुनः:-पुनः हृदय में प्रियतम के प्रेम की हिलोरें उठ रही हैं। जलवृष्टि के बहाने मानो पिया-मिलन-जन्य आनन्दाश्रु बरसा रही है। 'कृपालु' कहते हैं-अरी सखि! मेंढकों की रंग-निरंगी ध्वनि के द्वारा मानो आपने प्रियतम काले बादलों का गुणगान भी कर रही है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 795

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
