विरह-माधुरी · पद 92
गये कित, गोपन तजि गोपाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gaye kita, gopana taji gopāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1गये कित, गोपन तजि गोपाल।
2अति उदास नहिं भूख-प्यास तिन, पोवत अँसुवन-माल।
3हाय! कन्हैया! कहि-कहि पुनि-पुनि, गिरत धरणि बेहाल।
4उर लगाय इक बार जाहु पुनि, प्रान जात ततकाल।
5बेर लगैहौ तो पछितैहौ, जियत न पैहौ ग्वाल।
6तुम “कृपालु” मम प्रान प्रान बिनु, तनु न रहे नँदलाल॥
हिन्दी भावार्थ
(श्यामसुन्दर के मथुरा-गमन के पश्चात् ग्वाल बालों का विलाप-) हे गोपाल! हम सब ग्वाल-बालों को छोड़ कर तुम कहाँ चले गये हो? ग्वाल-बाल तुम्हारे वियोग में अत्यन्त उदास रहते हैं। न खाते हैं, न पीते हैं, सदा आँसू बहाते रहते हैं। हाय कन्हैया!''ऐसा कह-कह कर बार-बार मूर्च्छित हो जाते हैं और कहते हैं-एक बार अपने सखाओं को हृदय से लगा लो, फिर चाहे चले जाना। यदि आने में देर की तो पछताओगे। हम सब ग्वाल-बालों को जीवित न पा सकोगे। कृपालु' के शब्दों में-हे नन्दलाल! तुम मेरी आत्मा की आत्मा हो। तुम्हारे बिना आत्मा का अस्तित्व ही क्या है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 782-783