# गये कित, गोपन तजि गोपाल।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0843-M19-K092
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 92
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 393–393

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>गये कित, गोपन तजि गोपाल।  
<a id="line-2"></a>अति उदास नहिं भूख-प्यास तिन, पोवत अँसुवन-माल।  
<a id="line-3"></a>हाय! कन्हैया! कहि-कहि पुनि-पुनि, गिरत धरणि बेहाल।  
<a id="line-4"></a>उर लगाय इक बार जाहु पुनि, प्रान जात ततकाल।  
<a id="line-5"></a>बेर लगैहौ तो पछितैहौ, जियत न पैहौ ग्वाल।  
<a id="line-6"></a>तुम “कृपालु” मम प्रान प्रान बिनु, तनु न रहे नँदलाल॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्यामसुन्दर के मथुरा-गमन के पश्चात् ग्वाल बालों का विलाप-) हे गोपाल! हम सब ग्वाल-बालों को छोड़ कर तुम कहाँ चले गये हो? ग्वाल-बाल तुम्हारे वियोग में अत्यन्त उदास रहते हैं। न खाते हैं, न पीते हैं, सदा आँसू बहाते रहते हैं। हाय कन्हैया!''ऐसा कह-कह कर बार-बार मूर्च्छित हो जाते हैं और कहते हैं-एक बार अपने सखाओं को हृदय से लगा लो, फिर चाहे चले जाना। यदि आने में देर की तो पछताओगे। हम सब ग्वाल-बालों को जीवित न पा सकोगे। कृपालु' के शब्दों में-हे नन्दलाल! तुम मेरी आत्मा की आत्मा हो। तुम्हारे बिना आत्मा का अस्तित्व ही क्या है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 782-783

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
