विरह-माधुरी · पद 93
गये कित, प्रियतम नंदकुमार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gaye kita, priyatama nandakumāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1गये कित, प्रियतम नंदकुमार।
2तुम तो कहत रहे हम ऋणियाँ, तुम मम साहूकार।
3देवन आयुहुँ महँ नहिं करि सक, तुम्हरो प्रत्युपकार।
4कहत रहे तुम"प्रानन प्यारी, हैं सिगरी ब्रजनार"।
5पुनि कत भूलि गये ब्रजनारिन, तुम समरथ भरतार।
6हैं “कृपालु” हरि अवसरवादी, लबरन को सरदार॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी श्यामसुन्दर के वियोग में कहती है कि हे प्रियतम श्यामसुन्दर! तुम कहाँ चले गये। तुम तो हम लोगों से कहा करते थे कि सब ब्रजांगनाओं के हम ऋणियाँ हैं, तुम लोग साहूकार हो मैं देवताओं की उम्र में भी तुम लोगों के ऋण से उऋण नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त तुम यह भी कहते थे कि ब्रजांगनाएँ हमें प्राण से भी अधिक प्यारी हैं। फिर तुम हम लोगों को क्यों भूल गये, जब कि तुम समर्थ पति हो? कृपालु' ने कहा-अरी सखियों। ये ठाकुर जी अवसरवादी हैं, लबारों के नेता हैं, इनका सिद्धान्त बदलता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 783-784