विरह-माधुरी · पद 91
गये कित, गोधन तजि गोपाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gaye kita, godhana taji gopāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1गये कित, गोधन तजि गोपाल।
2को गोपाल बिना गो-पालहि, लखु उन गोधन हाल।
3रहीं रँभाय रैन-दिन तुम बिनु, कहति आव नँदलाल।
4तृन नहिं चर, नहिं पिय यमुना जल, तलफत रह सब काल।
5निशि-दिन नैनन नीर बहावति, कृश-तनु विरह बेहाल।
6कह “कृपालु” जस गोधन गति तस, बछरन गति भइ लाल॥
हिन्दी भावार्थ
(श्यामसुन्दर के मथुरा-गमन के पश्चात् ब्रजवासियों का करुण-क्रन्दन) हे गोपाल! तुम अपनी प्राणप्रिय गायों को छोड़कर कहाँ चले गये? तुम्हारे बिना गायों का पालन कौन करेगा? जरा इन गायों की दशा तो देख जाओ। ये तुम्हारे वियोग में रँभा रही हैं मानो कि कह रही हैं-''हे गोपाल आ जाओ।''ये गायें घास नहीं चरतीं, यमुना-जल नहीं पीतीं, दिन-रात तड़पती रहती हैं! प्रतिक्षण आँसू बहाती हैं। तुम्हारे वियोग में इनके अस्थिपंजर मात्र रह गये हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि जैसी दयनीय दशा गायों की है, ठीक वैसी ही बछड़ों की भी है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 782