विरह-माधुरी · पद 90
क्रूर वह विधि या यह अक्रूर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: krūra vaha vidhi yā yaha akrūra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1क्रूर वह विधि या यह अक्रूर।
2इक सखि कह प्रत्यक्षहिं दीखत, यह अक्रूरहिं क्रूर।
3येहि पुनि-पुनि कर जोरि निहोरति, भरि दृग अँसुवन-पूर।
4पै टुक हम ढिग लखत न बोलत, चहत सबै किय सूर।
5दूजी कह सखि विधि-अधीन सब, सोइ अरि मम सिंदूर।
6कह “कृपालु” जेहि वश विधि सोइ तव, प्राण-सजीवन-मूर॥
हिन्दी भावार्थ
(श्यामसुन्दर के मथुरा-गमन के समय सखियाँ परस्पर विचार-विमर्श कर रही हैं-) एक सखी कहती है-''अरी सखि! अक्रूर क्रूर है अथवा विधाता क्रूर है? सखी ने उत्तर दिया ''अक्रूर की क्रूरता प्रत्यक्ष ही दीख रही है। देखो तो हम लोग आँसू बहाते हुए हाथ जोड़कर इसका निहोरा कर रहे हैं फिर भी यह अङ्रूर न तों हम लोगों की ओर देखता है और न बोलता ही है। श्यामसुन्दर को ले जाकर हम लोगों को नेत्रहीन बनाना चाहता है।''दूसरी सखी ने कहा-''अरी सखि! सभी जीव विधि के अधीन हैं वही हमारे सुहाग का दुश्मन है।''इतने में 'कृपालु' ने कहा-अरी सखियों! श्यामसुन्दर सर्वशक्तिमान् भगवान् हैं वे विधि के अधीन नहीं हैं अपितु उन्हीं के अधीन विधाता है। अतएव अक्रूर एवं विधाता दोनों ही निर्दोष हैं। यह सारी करामात तो तुम्हारे श्यामसुन्दर की ही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 781-782