लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 89

क्रूर!, तू कत अक्रूर कहाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: krūra! tū kata akrūra kahāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1क्रूर!, तू कत अक्रूर कहाय।

2कुलिश करोर कठोर तोर हिय, कहु केहि धातु बनाय।

3धनि धनि अवनि जननि उन जिन तोहिं, जाय माय पद पाय।

4सखियन गति अँखियनहूँ देखत, हा! कत नहिं पतियाय।

5लै ले प्राण प्राणप्रिय दै दे, प्राण हाय! अब जाय।

6कह “कृपालु” बहुब्रीहि समासहिं, क्रूर न जासों पाय॥

हिन्दी भावार्थ

(मथुरा गमन के समय अक्रूर के प्रति ब्रजांगनाओं की उक्ति।) अरे क्रूर! तेरा नाम अक्रूर कैसे पड़ गया? करोड़ों वज्र के समान तेरा कठोर हृदय किस धातु से बनाया गया है? उस पृथ्वी एवं उस तेरी माता को क्या कहूँ, जिसने तुझे पैदा करके माता के पद को लज्जित किया है। तू अपनी आँखों से भी सखियों की दयनीय दशा देखकर विश्वास नहीं करता। हम लोगों का प्राण ले ले, किन्तु हमारे प्राण श्यामसुन्दर को न ले जा। हम लोगों का प्राण कथमपि नहीं रह सकता। इतने में 'कृपालु' ने कहा-अरी ब्रजांगनाओं! 'अक्रूर' शब्द में बहुब्रीहि समास है जिसका अर्थ है जिनके समान विश्व में कोई भी क्रूर न हो। अतएव उसका क्रूर व्यवहार स्वाभाविक ही है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 780-781