विरह-माधुरी · पद 88
क्यों बात बनावति नागरी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kyoṁ bāta banāvati nāgarī?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1क्यों बात बनावति नागरी।
2यह विरहाग लाग उर जाके, रैन रैन भर जाग री।
3सुधि बुधि भूलि जात तनु सिगरी, जाति लाज सब भाग री।
4नैनन नीर-फुहारे छूटत, तलफति नित विरहाग री।
5बावरि ह्वै के नाचति गावति, प्रेम-सुधा-रस पाग री।
6जाके लगत “कृपालु” आग री, सोइ जानति गुन आगरी॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखि! तू इतनी बातें क्यों बना रही है? यह विरह की द परवान बा बा पा जा ह जिसके हृदय में लग जाती है वह रात-रात भर नहीं सोती। वह अपने शरीर की सुधि-बुधि भूल जाती है। उसकी लज्जा भी समाप्त हो जाती है। आँखों से आँसुओं के फव्वारे से छूटते हैं एवं विरह की आग में निरंतर जला करती है। दीवानी होकर प्रेम-रस सराबोर कभी नाचती है कभी गाती है। 'कृपालु' के शब्दों में अरी सखि! जिसके हृदय में यह विरह की आग लगती है बस वही उसे जान सकती है। तूने किसी से प्रेम किया ही नहीं इसीलिए लेक्चर दे रही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 779-780