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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 87

क्यों पिय!, इतनो इतराय रे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kyoṁ piya! itano itarāya re

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1क्यों पिय!, इतनो इतराय रे।

2तुम्हरे दरस हेतु दृग तरसत, निशि दिन जल बरसाय रे।

3जो बेपीर! पीर दइ तो क्यों, औषधि नाहिं बताय रे।

4एक बार दिखराउ कमल मुख, काहे को तरसाय रे।

5तितनोइ विरह सताय हाय मोहिं, जितनोइ तू मुसकाय रे।

6जो “कृपालु” नहिं आय सके तो, मोहीं काहिं बुलाय रे॥

हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है कि अरे प्रियतम श्यामसुन्दर! तू इतना क्यों इतरा रहा है? ये मेरी आँखें तुम्हारे दर्शन के लिए तरस रही हैं, दिन-रात आँसू बरसा रही हैं। अरे बेपीर! अगर तूने पीर दी थी तो उसको दवा भी बतानी चाहिए थी। एक बार मनोहर झाँकी दिखा दे। इतना क्यों तरसा रहा है। तू जितना अधिक मुस्कराता है उतना ही अधिक विरह कष्ट देता है। कृपालु' के शब्दों में, अगर तू किसी भी प्रकार नहीं आ सकता तो मुझको ही बुला ले।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 779