विरह-माधुरी · पद 86
कौन यह, विरह बनायो हाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kauna yaha, viraha banāyo hāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कौन यह, विरह बनायो हाय।
2जेहि लगि विरहिनि हाय! हाय! करि, तलफति रहति सदाय।
3जो यह विरह बनावन रह तो, काहे मिलन बनाय।
4जेतिक मिलन हँसाय हाय! सखि!, तेतिक विरह रुवाय।
5पुनि जो विरह बनाय वाय कत, मधुर-वेदना माय।
6कह “कृपालु” पुनि विरह-वेदना, छिन-छिन बाढ़ति जाय॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! किस विधाता ने विरह का निर्माण किया है? जिस विरह को पाकर विरहिणी प्रतिक्षण हाय! करके तड़पती रहती है। अरी सखि! यदि उस क्रूर विधाता को विरह बनाना ही था तो मधुर-मिलन का निर्माण क्यों किया? यह मधुर-मिलन का सुख जितनी मात्रा में हँसाता है उतनी ही मात्रा में विरह का दुःख भी रुलाता है। अरी सखि! एक आश्चर्य यह भी है कि यदि उसे विरह बनाना ही था तो उस वेदना में मधुरता का निर्माण क्यों किया? इतने में 'कृपालु' ने कहा-अरी सखि! एक आश्चर्य मुझे और है कि वह मधुर बेदना प्रतिक्षण वर्धमान बनायी गयी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 778-779