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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 85

कुँवरि!, तू कितै गई डरपाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari! tū kitai gaī ḍarapāya?

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कुँवरि!, तू कितै गई डरपाय।

2रहि रहि कंप, पुलक तनु सिगरे, स्वेद-बिंदु दरसाय।

3सोवत कबहुँक उचकि चौंकि उठि, भाजति इत-उत धाय।

4कबहुँक हँसत ठठाइ, कबहुँ कहि,"हाय!", दृगन झरि लाय।

5कबहुँक कछु बतराति आपुहीं, कबहुँक मौन लखाय।

6कबहुँक दृग आनँद जल बरसत, कबहुँक कुपित जनाय।

7कबहुँक तांडव नृत्य कबहुँ पुनि, अति सलज्ज बनि जाय।

8कबहुँक रहति चेतना कबहुँक, तोहिं मूर्छा आय।

9ललिता यों “कृपालु” उठि बोलीं, लागी बुरी बलाय॥

हिन्दी भावार्थ

(किशोरी जी के प्रेम के चिह्लों को देखकर एक सखी यह समझकर कि किशोरी जी कहीं डर गई हैं, उनसे पूछती है।) हे किशोरी जी! तुम कहाँ डर गयीं? रह-रहकर तुम्हारे सारे शरीर में रोमांच हो उठता है, शरीर काँपने लगता है एवं अत्यधिक पसीना निकलता है। तुम कभी सोते-सोते चौंककर अचानक बैठ जाती हो एवं पुनः उठकर इधर-उधर भागने लगती हो। कभी खिलखिलाकर हँसती हो, कभी हाय! हाय!! कहकर आँखों से आँसू बरसाती हो। कभी अपने आप ही कुछ बात सी करती हो एवं कभी अत्यन्त ही मौन साध लेती हो। कभी तो तुम्हारी आँखों से आनन्द के आँसू बरसने लगते हैं एवं कभी क्रुद्ध-सी प्रतीत होती हो। कभी तो ताण्डव नृत्य सरीखा नाचती हो एवं कभी अत्यन्त ही लज्जाशील बन जाती हो। तुम्हें कभी तो संसार का भान रहता है और कभी मूर्च्छां आ जाती है। 'कृपालु' कहते हैं कि इतने में ही ललिता ने सांकेतिक भाषा में कहा कि इनके कोई बलाय लग गई है। ललिता का वास्तविक अभिप्राय यह है कि किसी से लगन लगी हुई अत्यन्त ही बुरी बलाय होती है अर्थात् किशोरी जी की प्यारे श्यामसुन्दर से लगन लग गई है। उन्हें न तो भूत लगा है और न कहीं डरी ही हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 777-778