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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 84

किशोरी पद किंकर श्याम सुजान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kishorī pada, kiṅkara shyāma sujāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1किशोरी पद किंकर श्याम सुजान।

2नवल-निकुंज-मंजु बिच नित ही, चापत चरनन कान्ह।

3कबहुँक चँवर ढुरावत कबहुँक, खड़ो लिये पिकदान।

4बरसाने की गलियन बिच नित, करत लली-गुनगान।

5माँगत कृपा किशोरी जू की, करि करि सुयश बखान।

6दृग अँसुवन सों चरण पखारत, जब राधे कर मान।

7हा हा! खात सखिन सों याचत, राधे दर्शन दान।

8गहवर गलिन रटत नित"राधे!", बिंधे, प्रिया-दृग-बान।

9बड़भागी “कृपालु” सो पिवु जो, राधे हाथ बिकान॥

हिन्दी भावार्थ

श्री श्यामसुन्दर किशोरी जी के युगल चरण कमलों के सनातन दास हैं। सदा ही मनोहर नूतन निकुँजों के बीच किशोरी जी के चरणों को दबाया करते हैं। कभी तो श्यामसुन्दर किशोरी जी की चँवर डुलाते हैं, कभी पीकदान लिये खड़े रहते हैं। बरसाने की, गलियों में किशोरी जी के गुणों को गाते हुए फिरा करते हैं एवं किशोरी जी के यश का बखान करते हुए उनसे कृपा की भीख मांगते हैं। जब किशोरी जी मान करती हैं तब श्यामसुन्दर उनके चरणों में आँसू बहाते हुए मनाते हैं। किशोरी जी के वियोग में उनके दर्शनार्थ उनकी दासियों की हा! हा! खाते हैं। गह्वरवन की वीथियों में किशोरी जी के कटाक्षों से घायल हुए राधे! राधे! पुकारा करते हैं। कृपालु' कहते हैं कि वे श्यामसुन्दर बड़े भाग्यशाली हैं जो हमारी स्वामिनी जी की दासता करते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 776-777