विरह-माधुरी · पद 83
किये इन नैनन बंटाढार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kiye ina nainana baṇṭāḍhāra!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1किये इन नैनन बंटाढार।
2ये निगुरे अस बुरे करन गये, द्वै नैनन कहँ चार।
3भये न नैनहुँ चार गये इत, द्वै लै नंदकुमार।
4अब इन नैनन नीर बहावत, जब बाजी गइ हार।
5सुनु सजनी! जो लै गयो, लै गयौ, दै गयो पीर अपार।
6जब “कृपालु” सब लूटि लै गयो, तब जागे का सार॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है अरी सखि! इन आँखों ने सत्यानाश कर दिया। ये निगोड़े नेत्र ऐसे बुरे हैं कि श्यामसुन्दर के पास दो से चार होने गये थे। चार होना तो दूर रहा अपने दो नेत्रों से भी हाथ धो बैठे। जब बाजी हार गये तब अब निरन्तर आँसू बहा रहे हैं। अरी सखि! हमारे दो नेत्र जो श्यामसुन्दर ले गये थे उसकी विशेष चिन्ता नहीं किन्तु उसके बदले में जो असह्य विरह की पीड़ा दे दी वह सही नहीं जाती। कृपालु' कहते हैं कि अरी सखि! जब चोर सब कुछ लूट ले गया तब जागने में क्या सार है अर्थात् अब पछताने से क्या लाभ है?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 775