विरह-माधुरी · पद 82
कान्ह बिनु, कैसे राखूँ प्रान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kānha binu, kaise rākhūṁ prāna?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कान्ह बिनु, कैसे राखूँ प्रान।
2जेहि आँगन नित लालन खेलत, रह अब भयेउ मसान।
3वह छवि पल छिन कबहुँ न भूलति, हिय हूलति मुसकान।
4कैसे बिसराऊँ भोरे मुख, की तुतरिन बतियान।
5वह मैया! मैया! की धुनि जनु, अबहूँ आवति कान।
6उठति करेजे हूक सुरति करि, लरिकैयन की बान।
7अब “कृपालु” यशुमति के वे दिन, ह्वै गये सपन समान॥
हिन्दी भावार्थ
(अपने लाला के वियोग में मैया यशोदा कहती अपने लाला के बिना मैं अब किस प्रकार जीवित रहूँ। जिस आँगन में लाल विविध प्रकार की बाल-लीलाएँ किया करता था, वही आँगन उसके बिना श्मशान के समान अत्यन्त ही भयानक बन गया है। रक क्षण को भी नहीं भूलती एवं उसकी मधुर-मुस्कान मेरे हृदय में शूल सी बनकर चुभती रहती है। अपने लाला के भोले-भाले मुख की तोतली-तोतली बातों को कैसे भुला दूँ। मुझे बुलाने की 'ओ मैया! ओ मैया!! ध्वनि मानो आज भी कान में सुनाई पड़ती है। लड़कपन की आदतों का स्मरण कर-करके मेरे कलेजे में निरन्तर हूक-सी उठा करती है। के लिये वे दिन अब स्वप्न के समान हो गये हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 774-775