विरह-माधुरी · पद 81
कान्ह की बात रही अब कान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kānha kī bāta rahī aba kāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कान्ह की बात रही अब कान।
2वे दिन जब नित नव-रस बरसत, ह्वै गये सपन समान।
3वे बातें जनु भई कहानी, सदा ऋणी निज जान।
4वे सब दिव्य विलास-रास भये, इंद्रजाल उनमान।
5वे यमुना-तट वंशीवट अरु, वृंदावन भये आन।
6वे “कृपालु” गो, गोप, ग्वालिनी, प्रियतम बिनु पियरान॥
हिन्दी भावार्थ
श्रीकृष्ण वियोगिनी ब्रजगोपियाँ अपने-आप कहती हैं कि श्यामसुन्दर की वे रसमयी बातें अब कान में ही रह गईं अर्थात् अब वह रस अत्यन्त दुर्लभ हो गया। वे दिन, जबकि ही प्रियतम श्यामसुन्दर के द्वारा नये-नये रस बरसाये जाते थे, अब स्वप्न के समान हो गये। प्रियतम की वे बातें कि ऐ गोपियों! मैं तुम लोगों से कभी भी उऋण नहीं हो सकता। मैं सदा ही तुम लोगों का ऋणी रहूँगा', कहने मात्र की हो गयीं। वे प्रियतम के द्वारा प्राप्त दिव्य रास-विलास भी इन्द्रजाल के समान लुप्त हो गया। वे यमुनातट, वंशीवट एवं वृन्दावन भी मानो दूसरे-से प्रतीत होते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि वे गायें गोप तथा ब्रज-गोपिकाएँ प्रियतम श्यामसुन्दर के बिना पीली पड़ गई हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 773-774