लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 80

कहो पिय!, किन तोहिं रसिक बनायो।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kaho piya!, kina tohiṁ rasika banāyo

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कहो पिय!, किन तोहिं रसिक बनायो।

2कब वराह बनि रूप-राशि-बल, मोहनमदन कहायो।

3धरि तनु मीन वारि बिच बसि कब, गोपिन चीर चुरायो।

4ललित त्रिभंग रूप धरि कच्छप, कब वर वेनु बजायो।

5राघवेन्द्र, वामन बनि कब तुम, सखियन रास रचायो।

6कब नृसिंह बनि रुद्ररूप धरि, प्रणय-मान-रस पायो।

7लहि “कृपालु” राधे-बल कछु रस, रसिकन नाम गिनायो॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखी कहती है कि हे प्रियतम! यह तो बताओ कि तुमको रसिक बनाया किसने है? तुम पूर्व शूकरावतार में अपने सौन्दर्य के नल पर कब "मदन मोहन'कहलाये थे? मत्स्यावतार में तुमने मछली का शरीर धारण करके जल ही में रहते हुए कब गोपियों का चीर हरण किया था? कच्छपावतार में तुमने कछुए का शरीर धारण करके कब शरीर के तीन भाग से टेढ़े होकर मधुर मुरली की तान छेड़ी थी? रामावतार एवं वामनावतार में तुमने गोपियों के साथ कब महारास का रसास्वादन किया था? नृसिंहावतार में कब उस भयानक रूप द्वारा किसी प्रेयसी को मजाने या स्वयं मान करने का रस पाया था? 'कृपालु' कहते हैं कि किशोरी जी की कृपा से ही कुछ रस पाकर इस कृष्णावतार में अपने को भी रसिक मानने लगे। उसके पूर्व अवतारों में दैत्य-हनन, साधु-परित्राण एवं धर्म संस्थापन के सिवाय और किया ही क्या था?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 772-773